बिसवां सीतापुर लेखराज : विकास खंड बिसवां की ग्राम पंचायत जमौरा इन दिनों मनरेगा फर्जीवाड़े की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है। शिशुपाल के खेत से संतोष महाराज के खेत तक चल रहा चकबंदी कार्य लगातार विवादों में है।
अब नए खुलासे यह बता रहे हैं कि प्रधान–सचिव की मिलीभगत ने सरकारी योजनाओं को अपनी निजी कमाई का साधन बना दिया है। ग्राम पंचायत में मनरेगा कार्य ठेकेदारों से कराए जा रहे हैं,
जो कि सीधे-सीधे योजना के खिलाफ है। वहीं, रोजगार सेविका मोहिता का भी नाम सामने आ रहा है जहाँ मजदूरों की फर्जी हाजिरी, और किसी अन्य जगह के फोटो डाउनलोड कर, दो मोबाइलों की सेटिंग के सहारे फर्जी फोटो अपलोड किए जा रहे हैं।
सवाल उठता है आखिर यह खेल किसके इशारे पर चल रहा है?
सूत्रों के मुताबिक, पंचायत में चल रही लूट कोई एक-दो दिन का खेल नहीं, बल्कि कई लाखों की सरकारी धनराशि का बंदरबांट है। विभागीय कर्मचारियों के मौन ने भ्रष्टाचार को और बढ़ावा दिया है।
जबकि गांव के मजदूरों ने कैमरे पर साफ-साफ कहा कि उनके नाम पर फर्जी M.B. (मेजरमेंट बुक) बनाई गई, मजदूरी खातों में भेजकर निकलवा ली जाती है,
और बाद में उन्हें सिर्फ 200–300 रुपये पकड़ाकर चलता कर दिया जाता है। मजदूर कभी काम पर न आए हों—फिर भी हाजिरी पक्की! यही नहीं, कई मजदूर जो गांव में ही नहीं रहते, उनके नाम पर भी भुगतान दिखा दिया गया।
मनरेगा योजना में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कोई ग्रामीण आवाज उठाए तो उसे इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वह टूटकर घर बैठ जाता है। यह पूरी प्रक्रिया न सिर्फ सरकारी धन की लूट है,

बल्कि ग्रामीणों की मेहनत और अधिकारों की खुलेआम हत्या है। जब खंड विकास अधिकारी बिसवां से इस मामले पर बात करने की कोशिश की गई तो फोन नहीं उठाया। अब देखना यह है
कि उच्च अधिकारी इस ज़बरदस्त घोटाले पर क्या कार्रवाई करते हैं, या फिर पंचायत–ठेकेदार–कर्मचारी की यह तिकड़ी यूँ ही मनरेगा को अपना एटीएम बना रखेगी?
Author: theswordofindia
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