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33 वर्ष बाद भी बाबरी मस्जिद की शहादत पर मुंबई की सड़कों पर गूंजी अज़ान और दुआ

33 वर्ष बाद भी बाबरी मस्जिद की शहादत पर मुंबई की सड़कों पर गूंजी अज़ान और दुआ

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मुंबई : 6 दिसंबर 1992 देश के इतिहास का वह काला दिन है जिसे आज 33 वर्ष बीत जाने के बाद भी मुसलमान भुला नहीं पा रहे। बाबरी मस्जिद की शहादत की यादें आज भी लोगों के दिलों में ताज़ा हैं,

और इसी जज़्बे को ज़िंदा रखने के लिए हर साल की तरह इस बार भी रज़ा अकादमी ने मुंबई की सड़कों पर सामूहिक अज़ान और दुआ का आयोजन किया।

शनिवार 6 दिसंबर 2025 को मीनारा मस्जिद, ख़त्री मस्जिद सहित कई इलाकों में सैकड़ों लोगों ने हाथों में तख्तियाँ लेकर बाबरी मस्जिद से अपनी मोहब्बत और जुड़ाव का इज़हार किया।

33 वर्ष बाद भी बाबरी मस्जिद की शहादत पर मुंबई की सड़कों पर गूंजी अज़ान और दुआ

इन तख्तियों परबाबरी मस्जिद ज़िंदाबादऔरबाबरी मस्जिद हमेशा कायम रहेगीजैसे नारे लिखे थे। इस अवसर पर रज़ा अकादमी के सरपरस्त हाजी मोहम्मद सईद नूरी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि बाबरी मस्जिद की शहादत केवल एक ढांचे का गिरना नहीं, बल्कि पूरी उम्मतमुस्लिम के दिलों पर लगा वो ज़ख्म है

जो आज तक भरा नहीं। हाजी नूरी ने 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा किइंसाफ़ के नाम पर एकतरफ़ा फैसला सुनाकर मुसलमानों की आस्था को नजरअंदाज किया गया।

इसेआस्था का मामलाकहा गया, लेकिन असल में यह इंसाफ़ का गला घोंटना था।उन्होंने कहा कि सामूहिक अज़ान और दुआ का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को यह बताना है

कि किस तरह 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को शहीद किया गया और इस घटना ने देश की गंगाजमुनी तहज़ीब को गहरी चोट पहुँचाई। कार्यक्रम में मौजूद मौलाना अमानुल्लाह रज़ा ने कहा किबाबरी मस्जिद सिर्फ़ ईंट और पत्थर का नाम नहीं।

वह अल्लाह का घर था और उसकी हैसियत आज भी वही है।वहीं मौलाना मोहम्मद अब्बास रिज़वी ने आरोप लगाया कि मौजूदा सत्ता ने मुसलमानों की मस्जिद छीनी और अब राम मंदिर के निर्माण का राजनीतिक श्रेय ले रही है।

उन्होंने कहा कि समुदाय को मायूस होने की नहीं, बल्कि अपने हक़ की जद्दोजहद जारी रखने की ज़रूरत है। प्रोफेसर मौलाना महमूद अली ख़ान गोवंडी ने देशभर की वीरान मस्जिदों को इबादत से आबाद करने की अपील करते हुए कहा कि कई मस्जिदों की स्थिति बाबरी जैसी बनती जा रही है,

33 वर्ष बाद भी बाबरी मस्जिद की शहादत पर मुंबई की सड़कों पर गूंजी अज़ान और दुआ

इसलिए मुसलमानों को अपने सज्दों से इन्हें ज़िंदा रखना होगा। सामूहिक अज़ान और दुआ का यह कार्यक्रम देर शाम तक चलता रहा, जिसमें कई उलेमाकिराम और बड़ी संख्या में मुंबईवासियों ने शिरकत की।

कार्यक्रम का संदेश साफ़ थाबाबरी मस्जिद की यादें आज भी ज़िंदा हैं और यह जज़्बा आने वाली नस्लों तक पहुंचता रहेगा।

theswordofindia
Author: theswordofindia

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