यह केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि की कहानी नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति, सतत परिश्रम और आत्मविश्वास की जीवंत मिसाल है। डॉ. रजनीकान्त मिश्र का जीवन इस बात का प्रमाण है
कि शारीरिक चुनौतियां अगर इरादों के आगे छोटी पड़ जाएं, तो मंज़िल स्वयं रास्ता बना लेती है। प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) जनपद के ग्राम सिधवार में जन्मे डॉ. रजनीकान्त मिश्र महज छह माह की उम्र में पोलियो से ग्रस्त हो गए थे।
दाहिने पैर की गंभीर समस्या के कारण उनका बचपन अस्पतालों और ऑपरेशन थिएटरों के बीच बीता। पिता उन्हें इलाज के लिए मुंबई लेकर आए, जहां बड़े ऑपरेशन के बाद पांच वर्ष की उम्र में वे कैलिपर पहनकर चल पाए।
इसके बाद भी दो और जटिल ऑपरेशन हुए। सातवीं कक्षा तक पिता कभी पैदल तो कभी गोद में लेकर उन्हें स्कूल और अस्पताल ले जाते रहे। माता-पिता की चिंताएं स्वाभाविक थीं।
मां की आंखों में आंसू थे, तो पिता का व्यक्तित्व धैर्य और दृढ़ता का प्रतीक। उन्होंने बेटे को हालात से लड़ना सिखाया। इसी संस्कार का परिणाम रहा कि डॉ. मिश्र शिक्षा में सदैव अग्रणी रहे।
पूना बोर्ड और मुंबई विश्वविद्यालय में उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और चिकित्सा शिक्षा पूर्ण की। मेडिकल पढ़ाई के दौरान ही उनका रुझान साहित्य और कविता की ओर हुआ।

जीवन की व्यावहारिक जिम्मेदारियां उन्हें घाटकोपर स्थित हिंदूसभा हॉस्पिटल तक ले आईं, जहां उन्होंने प्रशासकीय दायित्वों के साथ अपनी काव्य साधना भी जारी रखी।
धीरे-धीरे वे हास्य-व्यंग्य, गीत और मुक्तक के मंचों पर पहचान बनाने लगे। टीवी चैनलों, एफएम रेडियो, प्रतिष्ठित काव्य मंचों और यहां तक कि फिल्मों में अभिनय के माध्यम से उन्होंने अपनी विशिष्ट छवि स्थापित की।
रिज़र्व बैंक, आईआईटी, आईआईएम, ओएनजीसी, एनटीपीसी, गेल, विभिन्न बैंकों, लायंस और रोटरी क्लब जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में उनकी प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को प्रभावित किया।
हिंदूसभा हॉस्पिटल में उन्हें “श्रेष्ठ अधिकारी” सम्मान मिला। कोविड काल में ऑक्सीजन प्रबंधन में उनकी भूमिका के लिए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा दो बार राजभवन में सम्मानित किया जाना उनके प्रशासनिक कौशल का प्रमाण है।
लंबे समय से विदेश में काव्यपाठ का स्वप्न देखने वाले डॉ. मिश्र का यह सपना तब साकार हुआ जब उन्हें लंदन आमंत्रित किया गया। हीथ्रो एयरपोर्ट पर कदम रखते ही वर्षों का संघर्ष आंखों से आंसुओं में ढल गया—ये आंसू पीड़ा के नहीं, विजय के थे।
आज वे अपनी सफलता का श्रेय परिवार, गुरुजनों, सहयोगियों और श्रोताओं को देते हैं। डॉ. रजनीकान्त मिश्र की यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, संकल्प अडिग हो तो “हिंदूसभा से हीथ्रो” तक का सफर तय किया जा सकता है।
Author: theswordofindia
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