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डायबिटीज़, टेस्टोस्टेरॉन और फर्टिलिटी: पुरुषों के स्वास्थ्य का वह त्रिकोण जिसकी अनदेखी भारी पड़ती है

डायबिटीज़, टेस्टोस्टेरॉन और फर्टिलिटी: पुरुषों के स्वास्थ्य का वह त्रिकोण जिसकी अनदेखी भारी पड़ती है

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प्रयागराज : अक्सर माना जाता है कि टाइप-2 डायबिटीज़ सिर्फ़ शरीर में शुगर कंट्रोल की समस्या है, लेकिन हाल के वर्षों में यह समझ और भी पक्की हुई है

कि इसका असर पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर भी गहरा होता है। बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ, प्रयागराज की फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. मधुलिका सिंह बताती हैं

कि कई पुरुष यह नहीं समझ पाते कि बढ़ी हुई ब्लड शुगर, गिरता टेस्टोस्टेरॉन और घटती फर्टिलिटी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यह वही त्रिकोण है जो अक्सर असिस्टेड रिप्रोडक्शन (आईयूआई/आईवीएफ) से पहले ही पुरुष की संभावनाओं को कम कर देता है।

ब्लड शुगर और शुक्राणुओं की गुणवत्ता

अनियंत्रित डायबिटीज़ पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर सीधा प्रभाव डालती है। बड़े शोधों में पाया गया है कि डायबिटीज़ वाले पुरुषों में वीर्य का आयतन, स्पर्म काउंट और शुक्राणुओं की गतिशीलता सामान्य पुरुषों की तुलना में कम होती है।

कुछ अध्ययनों ने यह भी दिखाया है कि ऊँची शुगर न केवल स्पर्म काउंट को प्रभावित करती है, बल्कि शुक्राणुओं के डीएनए में टूट-फूट और एपिजेनेटिक बदलाव भी बढ़ा सकती है।

इसका परिणाम यह होता है कि फर्टिलिटी ट्रीटमेंट शुरू होने से पहले ही शुक्राणुओं की गुणवत्ता पहले से कमज़ोर हो जाती है।

टेस्टोस्टेरॉन: वह कड़ी जो सब कुछ जोड़ती है

टाइप-2 डायबिटीज़ वाले पुरुषों में कम टेस्टोस्टेरॉन काफी आम पाया जाता है। यह हार्मोन सिर्फ़ यौन इच्छा या इरेक्शन तक सीमित नहीं है,

बल्कि अंडकोष में शुक्राणु बनने की पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करता है। टेस्टोस्टेरॉन के कम स्तर से न सिर्फ़ फर्टिलिटी संबंधित उपचारों की प्रभावशीलता घटती है,

बल्कि पुरुषों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और मेटाबॉलिक गड़बड़ियाँ भी बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि डायबिटीज़ और गिरते टेस्टोस्टेरॉन का मेल फर्टिलिटी को और जटिल बना देता है।

फर्टिलिटी ट्रीटमेंट में यह त्रिकोण क्यों महत्वपूर्ण?

डायबिटीज़, टेस्टोस्टेरॉन और फर्टिलिटी: पुरुषों के स्वास्थ्य का वह त्रिकोण जिसकी अनदेखी भारी पड़ती है

जब कोई दंपत्ति असिस्टेड रिप्रोडक्शन के बारे में सोचता है, तो ध्यान अधिकतर रिपोर्टों—स्पर्म काउंट, मोटिलिटी, मॉर्फोलॉजी—पर रहता है।

लेकिन अगर पुरुष के मेटाबॉलिक और हार्मोनल स्वास्थ्य को नजरअंदाज़ कर दिया जाए, तो ट्रीटमेंट के नतीजे उम्मीद से कमज़ोर हो सकते हैं।

कई पुरुष सामान्य दिखने वाली रिपोर्ट लेकर आते हैं, जबकि अंदर ही अंदर ब्लड शुगर, हार्मोन और स्पर्म क्वालिटी एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे होते हैं।

इसीलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं:

  • प्री-डायबिटिक या डायबिटिक पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन और वीर्य स्वास्थ्य की समय पर स्क्रीनिंग जरूरी है।
  • आहार, व्यायाम, वजन नियंत्रण और ग्लाइसेमिक मैनेजमेंट से हार्मोन और स्पर्म दोनों में सुधार संभव है।
  • उद्देश्य केवल “आईवीएफ कब करें?” नहीं होना चाहिए, बल्कि “शरीर को पहले बेहतर स्थिति में कैसे लाया जाए?” यह सोच ज़्यादा मायने रखती है।
theswordofindia
Author: theswordofindia

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