मुंबई : में वहदत–ए–इस्लामी हिंद की ओर से इस्लाम जिमखाना में आयोजित संगोष्ठी में आत्महत्या, कन्या–हत्या, नशाखोरी और पर्यावरण प्रदूषण जैसे गंभीर सामाजिक विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम दस दिवसीय अखिल भारतीय अभियान ‘पैग़ाम–ए–रहमत–ए–आलम’ का समापन सत्र था। मुख्य वक्ता संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुहम्मद ज़ियाउद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिए कानून आवश्यक हैं,
लेकिन स्थायी बदलाव के लिए व्यक्ति के भीतर नैतिक चेतना और जवाबदेही की भावना पैदा करना भी जरूरी है। उन्होंने बेटियों को बोझ समझने वाली मानसिकता को समाप्त करने पर जोर दिया।
लातूर से पहुंचीं सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता अरलिकर ने अपने जीवन का अनुभव साझा करते हुए कन्या–हत्या के खिलाफ चलाए जा रहे संघर्ष की जानकारी दी।
उन्होंने लिंग आधारित गर्भपात रोकने के लिए जागरूकता और सामूहिक प्रयासों को जरूरी बताया। डॉ. मुहम्मद अनीस ने ईमान और नैतिक मार्गदर्शन के महत्व पर प्रकाश डाला।
डॉ. इलियास खान ने पर्यावरण संरक्षण को नैतिक जिम्मेदारी बताया। प्रोफेसर इब्राहिम खलील आबिदी ने आत्महत्या के बजाय उम्मीद और जीवन के उद्देश्य पर जोर दिया, जबकि डॉ. अली अकबर घबरानी ने किशोरों को नशे से बचाने में परिवार और सकारात्मक आदर्शों की भूमिका बताई।
करीब तीन घंटे चले कार्यक्रम में कुरआन तिलावत, सलाम, वीडियो प्रस्तुति और सामाजिक आंकड़ों का प्रदर्शन भी हुआ।
आयोजकों ने कहा कि इन समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान कानून के साथ इंसान के अंतर्मन को बदलने में निहित है।
Author: theswordofindia
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