मुंबई : हिंदी पत्रकारिता आज अपनी विकास यात्रा के जिस मुकाम तक पहुँची है उसकी नींव में वे मराठी भाषी संपादक हैं जिन्होंने हमें भाषा की शुद्धता और शुचिता के संग साथ जन सरोकारों से जुड़ने का बीज मंत्र दिया।
माधवराव सप्रे जी ने जहाँ ‘छतीसगढ़ मित्र’के जरिये नवजागरण का मंत्र फूंका वहीं उन्होंने अर्थशास्त्र की हिंदी में शब्दावली दी।
संपादकचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर ने जहां अखबार को मानक वर्तनी दी वहीं हिंदी को श्री,श्रीमती व राष्ट्रपति जैसे शब्द दिये ।हिंदी पत्रकारिता के वर्तमान में उन शिखर संपादकों का बहुत बड़ा योगदान रहा जो मूलतः मराठी भाषी थे’।
यह विचार कथाकार,पत्रकार हरीश पाठक ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी,मुम्बई मराठी पत्रकार संघ व काशी वाराणसी विरासत फाउंडेशन द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘भारत: साहित्य एवं मीडिया महोत्सव’ में व्यक्त किये।
मराठी भाषी संपादकों का हिंदी पत्रकारिता के विकास में योगदान’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा,’किसी ने भाषा,किसी ने व्याकरण तो किसी ने साक्षात्कार विधा की शुरुआत की।
हम उन्हीं पुराधाओं की तैयार की जमीन पर आज मजबूती से खड़े हैं’। इस सत्र के अध्यक्ष डॉ किंशुक पाठक व मुख्य अतिथि प्रो सोमा बंधोपाध्याय (कुलपति: बाबासाहब अंबेडकर विश्वविद्यालय ,कोलकत्ता ) थीं।

बीज वक्तव्य डॉ जवाहर कर्णावत ने दिया।स्वप्निल नन्दकुमार,प्रो पवित्र श्रीवास्तव व अनिता दुवे ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि कमलेश भट्ट कमल ने व आभार शरद कुमार त्रिपाठी ने व्यक्त किया।
Author: theswordofindia
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